Author name: Team Bhaktisatsang

भक्ति सत्संग वेबसाइट ईश्वरीय भक्ति में ओतप्रोत रहने वाले उन सभी मनुष्यो के लिए एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिन्हे अपने निज जीवन में सदैव ईश्वर और ईश्वरत्व का एहसास रहा है और महाज्ञानियो द्वारा बतलाये गए सत के पथ पर चलने हेतु तत्पर है | यहाँ पधारने के लिए आप सभी महानुभावो को कोटि कोटि प्रणाम

धार्मिक क्रियाओ में पिले वस्त्र, खास धातु के पात्र और आसन क्यों आवश्यक और लाभदायक होता है ? जानिए

धार्मिक क्रियाओं में पीत-वस्त्र धारण क्यों ? आजकल कार्यानुसार वस्त्र धारण की धारण विविध क्षेत्रों में प्रचलित हो गई हैं। इसमें वातावरण निर्माण के लिए विशिष्ट पोशाक की आवश्यकता होती […]

शास्त्रानुसार आरोग्य के लिए कुश का आसन, भस्म का लेपन और पंचगव्य की महत्ता

कुश के आसन की महत्ता क्यों ? पुराणों के अनुसार जब भगवान विष्णु वाराह रूप धारण कर समुद्र में छिपे असुर हिरण्याक्ष का वध कर बाहर निकले तो उन्होनें अपने

अकालमृत्यु और असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप

महामृत्युंजय मंत्र जाप क्यों ? धर्मग्रंन्थों में भगवान शिव कों प्रसन्न करने, अकालमृत्यु से बचने तथा असाध्य रोगों से मुक्त होने के लिए भगवान शिव केे महामृत्युंजय मंत्र के जप

एकादशी व्रत क्यों किया जाता है ? जाने देवशयनी और देवोत्थान एकादशी के बारे में

एकादशी व्रत क्यों किया जाता है ? एकादशी तिथि को मनःशक्ति का केन्द्र चन्द्रमा क्षितिज की ग्यारहवीं कक्षा पर स्थित होता है। यदि इस अनुकूल समय में मनोनिग्रह की साधना

भगवन शिव की आराधना हेतु महेश नवमी उत्सव क्यों मनाया जाता है

महेश नवमी उत्सव क्यों ? हिंदू समाज का महेश्वरी वर्ग महेश (शिव) नवमी उत्सव धूमधाम से मनाता है। कहा जाता है कि इस वंश की उत्पत्ति शिव यानी महेश द्वारा

सुखी और सकारात्मक जीवन के लिये अपनाएं ये वास्तु टिप्स

वास्तु उपाय – Vastu Remedies  हर चीज़ को करने का एक सलीका होता है। जब चीज़ें करीने सजा कर एकदम व्यवस्थित रखी हों तो कितनी अच्छी लगती हैं। उससे हमारे

भैरव उपासना क्यों ? और क्यों विष्णु-स्वरूप होकर भी ये साक्षात् शिव के दूसरे रूप माने जातें है

भैरव उपासना क्यों ? धर्म-शास्त्रों में भैरव को एक विशिष्ट देवता कहा गया है। इनका एक स्वतंत्र आगम है, जो ‘भैरव आगम’ के नाम से जाना जाता है। भैरव को

ओंकार सर्वश्रेष्ठ क्यों ?

ओंकार सर्वश्रेष्ठ क्यों ? ‘ योग दर्शन ’ में कहा गया है ऊॅं साक्षात् ब्रह्म एतद्वि एवं अक्षर परम्। एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्।। ‘ओेंकार ’ की संकल्पना के

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