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प्राण – जानिए मुख्य और उपप्राण के बारे में तथा इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाडिय़ों का महत्त्व

प्राण के प्रकार – Types of Prana

हमने बहुत बार अपने जीवन में  व्यवहारिक रूपसे  “प्राण” (prana) शब्द का उपयोग किया है, परंतु हमे प्राण की वास्तविकता के बारे मे शायद ही पता हो , अथवा तो हम भ्रांति से यह मानते है की  प्राण का अर्थ जीव या जीवात्मा होता है, परंतु यह सत्य नही है,  प्राण वायु का एक रूप है, जब हवा आकाश में चलती है तो उसे वायु कहते है, जब यही वायु हमारे शरीर में 10 भागों में काम करती है तो इसे “प्राण” कहते है, वायु का पर्यायवाचि नाम ही प्राण है ।

मूल प्रकृति के स्पर्श गुण-वाले वायु में रज गुण प्रदान होने से वह चंचल, गतिशील और अद्रश्य है । पंच महाभूतों में प्रमुख तत्व वायु है । वात्, पित्त कफ में वायु बलिष्ठ है, शरीर में हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र – श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा अन्य सब अवयव -अंग इस प्राण से ही शक्ति पाकर समस्त कार्यों का संपादन करते है . वह अति सूक्ष्म होने से  सूक्ष्म छिद्रों में प्रविष्टित हो जाता है । प्राण को रुद्र और ब्रह्म भी कहते है ।

प्राण से ही भोजन का पाचन, रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य, रज, ओज, आदि धातुओं का निर्माण, फल्गु (व्यर्थ) पदार्थो का शरीर से बाहर निकलना, उठना, बैठना, चलना, बोलना, चिंतन-मनन-स्मरण-ध्यान आदि समस्त स्थूल व् सूक्ष्म क्रियाएँ होती है| प्राण की न्यूनता-निर्बलता होने पर शरीर के अवयव ( अंग-प्रत्यंग-इन्द्रियाँ आदि ) शिथिल व रुग्ण हो जाते है, प्राण के बलवान् होने पर समस्त शरीर के अवयवों में बल, पराक्रम आते है और पुरुषार्थ, साहस, उत्साह, धैर्य, आशा, प्रसन्नता, तप, क्षमा आदि की प्रवृति होती है |

शरीर के बलवान्, पुष्ट, सुगठित, सुन्दर, लावण्ययुक्त, निरोग व दीर्घायु होने पर ही लौकिक व आध्यात्मिक लक्ष्यों की पूर्ति हो सकती है, इसलिए हमें प्राणों की रक्षा करनी चाहिए अर्थात शुद्ध आहार , प्रगाढ़ निंद्रा , ब्रह्मचर्य, प्राणायाम आदि के माध्यम से शरीर को प्राणवान् बनाना चाहिए . परमपिता परमात्मा द्वारा निर्मित 16 कलाओं में एक कला प्राण भी है . ईश्वर इस प्राण को जीवात्मा के उपयोग के लिए प्रदान करता है | ज्यों ही जीवात्मा किसी शरीर में प्रवेश करता है, प्राण भी उसके साथ शरीर में प्रवेश कर जाता है तथा ज्यों ही जीवात्मा किसी शरीर से निकलता है, प्राण भी उसके साथ निकल जाता है |

श्रुष्टि की आदि में परमात्मा ने सभी जीवो को सूक्ष्म शरीर और प्राण दिया जिससे जीवात्मा प्रकृति से संयुक्त होकर शरीर धारण  करता है । सजीव प्राणी नाक से श्वास लेता है , तब वायु कण्ठ में जाकर विशिष्ठ रचना से वायु का दश विभाग हो जाता है । शरीर में विशिष्ठ स्थान और कार्य से प्राण के विविध नाम हो जाते है ।

मुख्य प्राण (prana) 5  है – Types of Prana

  1. प्राण
  2. अपान
  3. समान
  4. उदान
  5. व्यान

उपप्राण (upa Prana) 5  है – Types of Upa Prana

  1. नाग
  2. कुर्म
  3. कृकल
  4. देवदत
  5. धनज्जय

पंच प्राण – 5 Pranas

प्राण 

इसका स्थान नासिका से ह्रदय तक है, नेत्र, श्रोत्र , मुख आदि अवयव इसी के सहयोग से कार्य करते है | यह सभी प्राणों का राजा है, जैसे राजा अपने अधिकारीयों को विभिन्न स्थानों पर विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है, वैसे ही यह भी अन्य अपान आदि प्राणों को विभिन्न स्थानों  पर विभिन्न कार्यों के लिये नियुक्त करता है |

अपान 

इसका स्थान नाभि से पाँव तक है, यह गुदा इन्द्रिय द्वारा मल व वायु को उपस्थ ( मुत्रेन्द्रिय) द्वारा मूत्र व वीर्य को योनी द्वारा रज व गर्भ का कार्य करता है |

समान

इसका स्थान ह्रदय से नाभि तक बताया गया है, यह खाए हुए अन्न को पचाने तथा पचे हुए अन्न से रस, रक्त आदि धातुओं को बनाने का कार्य करता है |

उदान

यह  कण्ठ  से सिर ( मस्तिष्क ) तक के अवयवों में रहेता है , शब्दों का उच्चारण , वमन ( उल्टी ) को निकालना आदि कार्यों के अतिरिक्त यह अच्छे कर्म करने वाली जीवात्मा को अच्छे लोक ( उत्तम योनि ) में , बुरे कर्म करने वाली जीवात्मा को बुरे लोक ( अर्थात सूअर , कुत्ते आदि की योनि ) में तथा जिस आत्मा ने पाप – पुण्य बराबर किए हों , उसे मनुष्य लोक ( मानव योनि ) में ले जाता है ।

व्यान

यह सम्पूर्ण शरीर में रहेता है । ह्रदय से मुख्य 101 नाड़ीयाँ निकलती है , प्रत्येक नाड़ी की 100-100 शाखाएँ है तथा प्रत्येक शाखा की भी 72000 उपशाखाएँ है । इस प्रकार कुल 72721020 नाड़ी शाखा- उपशाखाओं में यह रहता है । समस्त शरीर में रक्त-संचार , प्राण-संचार का  कार्य  यही करता है तथा अन्य प्राणों को उनके कार्यों में सहयोग भी देता है ।

उपप्राण – 5 Upa Prana

नाग 

यह कण्ठ से मुख तक रहता है ।  उदगार (डकार ) , हिचकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते है ।

कूर्म

इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक है , यह नेत्रा गोलकों में रहता हुआ उन्हे दाएँ -बाएँ , ऊपर-नीचे  घुमाने की तथा पलकों को खोलने बंद करने की  किया करता है ।  आँसू भी इसी के सहयोग से निकलते है ।

कूकल

यह मुख से ह्रदय तक के स्थान में रहता है तथा  जृम्भा ( जंभाई =उबासी ) , भूख , प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है ।

देवदत्त

यह नासिका से कण्ठ तक के स्थान में  रहता है ।  इसका कार्य छिंक , आलस्य , तन्द्रा , निद्रा आदि को लाने का है ।

धनज्जय

यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक रहता है , इसका कार्य शरीर के अवयवों को खिचें रखना , माँसपेशियों को सुंदर बनाना आदि है । शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी बाहर निकल जाता है , फलतः इस प्राण के अभाव में शरीर फूल जाता है । जब शरीर विश्राम करता है , ज्ञानेन्द्रियाँ , कर्मेन्द्रियाँ स्थिर हो जाती है, मन शांत हो जाता है । तब प्राण और जीवात्मा जागता है । प्राण के संयोग से जीवन और प्राण के वियोग से मृत्यु होती है । जीव का अंन्तिम साथी प्राण है ।

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इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाडिय़ों का महत्त्व

प्राण नाड़ी-तन्त्र के माध्यम से संपूर्ण शरीर में प्रवाहित होता है। मानव-शरीर में 72,000 नाडिय़ां हैं, इनमें से मुख्य रूप से तीन नाडिय़ों का विशेष महत्त्व है :-

  • इडा ‘चन्द्र प्रणाली’, यह बायें नासिका-रन्ध्र (नथुने)से संबंधित है और अनुसंवेदी नाड़ी-तन्त्र है।
  • पिंगला ‘सूर्य प्रणाली’, यह दायें नासिका-रन्ध्र से संबंधित है और सहानुकम्पी नाड़ी-तन्त्र है।
  • सुषुम्ना ‘केन्द्रीय नाड़ी’, यह मेरुदण्ड से गुजरती है और केन्द्रीय नाड़ी-तन्त्र से संबंधित है।

आसनों और प्रणायामों के अभ्यास से इडा एवं पिंगला नाडिय़ां सुव्यवस्थित होती हैं और इसका सभी 72,000 नाडिय़ों पर ऊर्जा प्रवाह का शुद्ध, दृढ़ और सन्तुलनकारी प्रभाव होता है। प्राणायाम और ध्यान के अभ्यास सुषुम्ना नाड़ी में ऊर्जा-प्रवाह को बढ़ाते हैं। जब आध्यात्मिक ऊर्जा सुषुम्ना में प्रवाहित होती है विशेष मस्तिष्क केन्द्र और चक्र सक्रिय हो जाता है, जो हमारी चेतना का विकास और विस्तार उच्चतर आध्यात्मिक स्तर तक कर देते हैं।

प्राण स्वयं पूर्णत: शुद्ध और निष्पक्ष हैं, जिस प्रकार एक नदी की जल धारा स्पष्ट और स्वच्छन्द होती है। अपने मार्ग में नदी अनेक वस्तुओं को ग्रहण करती है जिससे पानी की कोटि बदल जाती है। ठीक ऐसा ही प्राण के साथ भी होता है। प्राण शरीर में शुद्ध और स्वच्छ प्रवाहित होता है, किन्तु यह विदा किस प्रकार होता है यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर है – उसकी जीवन शैली, उसके आन्तरिक गुण और भावनायें, भोजन का प्रकार जो ग्रहण किया एवं पर्यावरण और साथी जिसके साथ वह रहता है। प्राणों की गुणवत्ता जो व्यक्तियों से उद् भुत होती है, आसपास के पर्यावरण एवं व्यक्ति विशेष दोनों को प्रभावित करती है।

रक्त विद्यमान जीवन शक्ति का स्तर और उसके कोष मानव शरीर की स्थिति का निर्धारण करता है।

जितने अधिक कोष निष्क्रिय हो जाते हैं, व्यक्ति उतना ही अधिक कमजोर हो जाता है और जल्दी ही वृद्धावस्था की ओर जाने लगता है। जब प्राण का प्रवाह सीमित हो जाता है, परिणाम वही होता है। प्राण का प्रवाह उन चिन्ताओं से प्रभावित होता है जो हम स्वयं ही उत्पन्न कर लेते हैं। हम जितने अधिक शोकाकुल या अवसादग्रस्त होंगे, प्राण का प्रवाह भी उतना ही कमजोर होगा, जिससे हम रोगग्रस्त हो जायेंगे और वृद्ध होने की प्रक्रिया तेजी से चलने लगती है। दूसरी ओर, वे हैं जो सन्तुलित और जीवन स्फूर्ति को प्रसारित करते हैं, और उनका सामर्थ्य बढऩे से मानव बन्धुओं को भी आकर्षित करने लगते हैं। अत: हमें सदैव सार्थक प्राण प्रसारित करना चाहिए।

हम जिस प्राण को प्रसारित करते हैं (हमारा ‘स्पंदन’ या ‘प्रभा मंडल’), वह अन्य लोगों को स्पष्ट समझ में आता है। प्रभा मंडल का प्रकार हमारे विचारों और भावनाओं की शुद्धता पर निर्भर है, साथ-साथ हमारी शारीरिक जीवन शैली और स्वास्थ्य की शारीरिक स्थिति पर भी निर्भर है। मानसिक अशांति, आन्तरिक तनाव और बीमारी प्रभा मंडल में स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाती है, जैसे शरीर, मन और आत्मा का सुव्यवस्थित संतुलन दिखाई देता है।

यह अन्य लोगों के लिए विशेष लाभदायक है और स्वयं में भी सार्थक, विश्वस्त, विश्वासकारी एवं अच्छे विचार जाग्रत करता है। कुल मिलाकर, निषेधात्मक, आत्मघाती और द्वेषपूर्ण विचार हमारे लिए सर्वाधिक हानिकारक हैं। ऐसी मानसिकता स्वयं को जहर देना है। यही कारण है कि योग की आकांक्षा रखने वाले अपने विचार और भावनाओं को सदैव शुद्ध और सार्थक रखते हैं। ध्यान और मन्त्र का अभ्यास शुद्ध प्राण को बनाये रखता है और प्राणायाम का अभ्यास प्राण को संग्रहीत करने के सामर्थ्य को बढ़ाता है।

जब आत्मा शरीर को छोड़ती है और मृत्यु आती है, जीवन ऊर्जा भी शरीर से निकल जाती है। एक दिन मरना ही हमारा प्रारब्ध है, किन्तु हम इस तथ्य को हमेशा भूल जाते हैं। जब हम मरते हैं हम सब वस्तुएं पीछे छोड़ जाते हैं – अपना शरीर, सांसारिक संपत्तियां, मित्रों और शत्रुओं को भी। अत: जीवन का अर्थ रहता कहां है? जीवन का प्रयोजन वास्तविकता को पहचानना है। यह वास्तविकता दैवीय शक्ति (आत्मा)हमारे ही अन्दर है। यही है जिसको हम ध्यान में खोजते हैं, जब हम स्वयं से प्रश्न करते हैं : ‘कौन हूं मैं?’ जब हम स्व को पहचानते हैं, हमने स्व (आत्मा) का अनुभव कर लिया है।

इसको प्राप्त करने के लिए शारीरिक व्यायाम और श्वास विधियां मात्र बहुत कम हैं। इस अच्छाई के लिए पूरा जीवन ही प्रेरित होना चाहिए। हम जब घृणा, लोभ, क्रोध, द्वेष, जलन, इच्छाओं और निर्भरता से स्वतन्त्र होंगे और प्रेम, सुव्यवस्था तथा पर्यावरण को समझते हुए स्वयं के साथ रहेंगे, हमारी सभी समस्याएं हल हो जाएंगी। जब नित्य अभ्यास और जीवन का सार्थक मार्ग एक-दूसरे से इस प्रकार मिल जाते हैं कि वे एक हो जाएं तब हमारा प्रयास प्रभावी और सफल हो जाता है।

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