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जानिए भगवान् दत्तात्रेय की जन्म कथा, साधना विधि, अवतार और उनके 24 गुरुओ के बारे मे

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भगवान् दत्तात्रेय की जन्म कथा (Lord Dattatrey Birth Story)

हिंदू धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का एकरूप माना गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री दत्तात्रेय भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। वह आजन्म ब्रह्मचारी और अवधूत रहे इसलिए वह सर्वव्यापी कहलाए। यही कारण है कि तीनों ईश्वरीय शक्तियों से समाहित भगवान दत्तात्रेय की आराधना बहुत ही सफल, सुखदायी और शीघ्र फल देने वाली मानी गई है। मन, कर्म और वाणी से की गई उनकी उपासना भक्त को हर कठिनाई से मुक्ति दिलाती है।

कहा जाता है कि भगवान भोले का साक्षात् रूप दत्तात्रेय में मिलता है। जब वैदिक कर्मों का, धर्म का तथा वर्ण व्यवस्था का लोप हुआ, तब भगवान दत्तात्रेय ने सबका पुनरुद्धार किया था। हैहयराज अर्जुन ने अपनी सेवाओं से उन्हें प्रसन्न करके चार वर प्राप्त किए थे।

पहला बलवान, सत्यवादी, मनस्वी, आदोषदर्शी तथा सह भुजाओं वाला बनने का, दूसरा जरायुज तथा अंडज जीवों के साथ-साथ समस्त चराचर जगत का शासन करने के सामर्थ्य का, तीसरा देवता, ऋषियों, ब्राह्मणों आदि का यजन करने तथा शत्रुओं का संहार कर पाने का और चौथा इहलोक, स्वर्गलोक और परलोक विख्यात अनुपम पुरुष के हाथों मारे जाने का। एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पतिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अहंकार नष्ट करने के लिए लीला रची।

उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं।

तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पतिव्रत्य की परीक्षा लें। तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी और यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी।

अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गईं, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और कहा कि यदि मेरा पतिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं। ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे।

तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं।

तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया।

प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ। कार्तवीर्य अर्जुन (कृतवीर्य का ज्येष्ठ पुत्र) के द्वारा श्रीदत्तात्रेय ने लाखों वर्षों तक लोक कल्याण करवाया था। कृतवीर्य हैहयराज की मृत्यु के उपरांत उनके पुत्र अर्जुन का राज्याभिषेक होने पर गर्ग मुनि ने उनसे कहा था कि तुम्हें श्रीदत्तात्रेय का आश्रय लेना चाहिए, क्योंकि उनके रूप में विष्णु ने अवतार लिया है।

ऐसी मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय गंगा स्नान के लिए आते हैं इसलिए गंगा मैया के तट पर दत्त पादुका की पूजा की जाती है। भगवान दत्तात्रेय की पूजा महाराष्ट्र में धूमधाम से की जाती है। उनको गुरु के रूप में पूजा जाता है। गुजरात के नर्मदा में भगवान दत्तात्रेय का मंदिर है जहां लगातार 7 हफ्ते तक गुड़, मूंगफली का प्रसाद अर्पित करने से बेरोजगार लोगों को रोजगार प्राप्त होता है।

दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। श्री गुरुदेव दत्त भक्ति से प्रसन्न होकर स्मरण करने से ही विपदाओं से रक्षा करते हैं। गूलर वृक्ष दत्तात्रेय का सर्वाधिक पूजनीय रूप है। इसी वृक्ष में दत्त तत्व अधिक है। भगवान शंकर का साक्षात रूप महाराज दत्तात्रेय में मिलता है। तीनों ईश्वरीय शक्तियों से समाहित महाराज दत्तात्रेय की साधना अत्यंत ही सफल और शीघ्र फल देने वाली है।

महाराज दत्तात्रेय आजन्म ब्रह्मचारी, अवधूत और दिगंबर रहे थे। किसी प्रकार के संकट में बहुत जल्दी भक्त की सुध लेने वाले हैं। यदि मानसिक रूप से, कर्म से या वाणी से महाराज दत्तात्रेय की उपासना की जाए तो वे शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं।

भगवान् दत्तात्रेय ईश्वर और गुरु दोनों

दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं। इसलिए उन्हें  परब्रह्म मूर्ति सदगुरु और श्री गुरुदेव दत्त भी कहा जाता है। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साधक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। विविध पुराणों और महाभारत में भी दत्तात्रेय की श्रेष्ठता का उल्लेख मिलता है। वे श्री हरि विष्णु का अवतार हैं। वे पालनकर्ता, त्राता और भक्त वत्सल हैं तो भक्ताभिमानी भी।

भगवान् दत्तात्रेय साधना विधि (Dattatrey Sadhna Vidhi)

गुरुवार और हर पूर्णिमा की शाम भगवान दत्त की उपासना में विशेष मंत्र का स्मरण बहुत ही शुभ माना गया है। इसलिये जितना ज्यादा मंत्र जाप कर सकते हैं करना चाहिए। मंत्र जाप से पूर्व शुद्धता का ध्यान विशेष रूप से रखें और हो सके तो स्फटिक माला से रोज दोनो मंत्र का एक माला मंत्र जाप करें। दत्तात्रेय की उपासना ज्ञान, बुद्धि, बल प्रदान करने के साथ शत्रु बाधा दूर कर कार्य में सफलता और मनचाहे परिणामों को देने वाली मानी गई है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय भक्त की पुकार पर शीघ्र प्रसन्न होकर किसी भी रूप में उसकी कामनापूर्ति या संकटनाश करते हैं।

भगवान् दत्तात्रेय का दिव्य स्वरुप 

  • दत्तात्रेय भगवान का रूप तथा उनका परिवार भी आध्यात्मिक संदेश देता है।
  • उनका भिक्षुक रूप अहंकार के नाश का प्रतीक है। कंधे पर झोली, मधुमक्खी के समान मधु एकत्र करने का संदेश देती है।
  • उनके साथ खड़ी गाय कामधेनु है जो पृथ्वी का प्रतीक हैं ।
  • चार कुत्ते, चारों वेदों के प्रतीक माने गए हैं। गाय और कुत्ते एक प्रकार से उनके अस्त्र भी हैं। क्योंकि गाय अपने सींगों से प्रहार करती है और कुत्ते काट लेते हैं।

भगवान् दत्तात्रेय के अवतार

ऐतिहासिक युग में दत्त देवता के तीन अवतार श्रीपाद श्रीवल्लभ, श्री नृसिंह सरस्वती और मणिकप्रभु हुए। श्रीपाद श्रीवल्लभ भगवान दत्तात्रेय  के पहले अवतार थे । श्री नृसिंह सरस्वती उनके दूसरे और मणिकप्रभु तीसरे अवतार थे। चौथे अवतार श्री स्वामी समर्थ थे । यह चार पूर्ण अवतार हैं और इनके अतिरिक्त कई आंशिक अवतार भी हैं। श्री वासुदेवानंद सरस्वती उनमें से एक हैं । जैन नेमीनाथ के रूप में दत्तात्रेय की पूजा करते हैं।

जानिये भगवान् दत्तात्रेय के 24 गुरु कौन है ?

भगवान् दत्तात्रेय ने अपने जीवन में 24 गुरु बनाय थे। आइये जाने वो गुरु कौन है और उनसे उन्होंने क्या क्या सीखा:-

1 पृथ्वी – क्षमा और धैर्य।

2 वायु- विषयो से अनाशक्ति।

3 आकाश – आत्मा और परमात्मा की अभिन्नता।

4 जल – पवित्रता।

5 अग्नि – निर्लिप्तता।

6 चन्द्रमा – व्यवहार में शीतलता।

7 सूर्य – नियमित जीवन यापन करना।

8 कबूतर – मोह का त्याग।

9 अजगर- निश्चिन्तता।

10 समुद्र – प्रसन्न व् गंभीर रहना।

11 पतंगा – अजितेंद्रिय रहना।

12 भ्रमर – लोभ का त्याग।

13 मधुमक्खी – संग्रह नहीं करना।

14 हाथी – नारी के प्रति मोह त्यागना।

15 हिरन- विरक्ति।

16 मछली – रसेन्द्रिय वश।

17 वेश्या – भोग का त्याग व् वैराग्य।

18 कुरर पक्षी- जीभ लोलुपता।

19 शिशु- मान अपमान सहना।

20 कुँवारी कन्या – एकांत वास।

21 लोहार – मन की एकाग्रता और कर्मनिष्ठा।

22 सर्प- मठादि न बनना।

23 मकड़ी – अद्वैतवाद।

24 भृगड़ी कीट-एकाग्र मन से भगवान् का चिंतन।

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