Devshayani Ekadashi – देवशयनी एकादशी का महत्व, कथा और पर्व से जुड़ी पौराणिक मान्यताएँ

Devshayani Ekadashi – देवशयनी एकादशी

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। भारत में कई जगह इस तिथि को ‘पद्मनाभा’ भी कहते हैं और इस एकादशी को शयनी एकादशी, महा-एकादशी, प्रथमा एकादशी, पद्मा एकादशी और देवोपदी एकादशी भी कहा जाता है। माना जाता है कि सूर्य के मिथुन राशि में आने पर ये एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर उन्हें उठाया जाता है। उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। इस बीच के अंतराल को ही चातुर्मास कहा गया है। इस दौरान किसी प्रकार के शुभ कार्य जैसे विवाह आदि नहीं किये जाते। धार्मिक दृष्टि से यह चार मास भगवान विष्णु का निद्रा काल माना जाता है।

माना जाता है कि इन दिनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं। इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि इन चार महीनों में भू-मण्डल के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं लेकिन इस बार कोरोना काल में सभी तरह के बड़े धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन पर रोक है। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखता है। देवशयनी एकादशी के रूप भी देश में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग देखने को मिलते हैं। महाराष्ट्र में इस दिन भगवान विट्ठल की पूजा की जाती है।

Devshayani Ekadashi  – भगवान के शयन से जुड़ी मान्यता

मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया था इसलिए उसी दिन से आरम्भ करके भगवान चार मास तक क्षीर समुद्र में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। यह भी कहा जाता है कि भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर उसे पाताल लोक का अधिपति बना दिया और वर मांगने को कहा।

बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। बलि के इस वर से लक्ष्मी जी सोच में पड़ गयीं और उन्होंने बलि को भाई बना लिया और भगवान को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। कहा जाता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वर का पालन करते हुए तीनों देवता 4-4 माह सुतल में निवास करते हैं। भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक, भगवान शिव महाशिवरात्रि तक और भगवान ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं।

Devshayani Ekadashi – भगवान श्रीविष्णु को प्रसन्न करने का बहुत अच्छा समय

इस दिन उपवास करके श्री हरि विष्णु की सोना, चांदी, तांबा या पीतल की मूर्ति बनवाकर उसका षोडशोपचार सहित पूजन करके पीताम्बर आदि से विभूषित कर सफेद चादर से ढके गद्दे तकिये वाले पलंग पर उसे शयन कराना चाहिए। श्रद्धालुओं को चाहिए कि इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करें। मधुर स्वर के लिए गुड़ का, दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए तेल का, शत्रु नाश आदि के लिए कड़वे तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करें।

Devshayani Ekadashi Vrat Katha – देवशयनी एकादशी व्रत कथा

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की, तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि सतयुग में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। राजा इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है। उनके राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। इससे चारों ओर त्राहि त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन, पिण्डदान, कथा व्रत आदि सबमें कमी हो गई। दुखी राजा सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन सा पाप किया है जिसका दण्ड पूरी प्रजा को मिल रहा है।

फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का उपाय खोजने के लिए राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए। वहां वह ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें प्रणाम कर सारी बातें बताईं। उन्होंने ऋषिवर से समस्याओं के समाधान का तरीका पूछा तो ऋषि बोले− राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है। इसमें छोटे से पाप का भी भयंकर दण्ड मिलता है।

ऋषि अंगिरा ने कहा कि आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी। राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का पूरी निष्ठा के साथ व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और अकाल दूर हुआ तथा राज्य में समृद्धि और शांति लौटी इसी के साथ ही धार्मिक कार्य भी पूर्व की भांति आरम्भ हो गये।

Devshayani Ekadashi Puja Vidhi – देवशयनी एकादशी पूजा विधि

इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सबसे पहले भगवान विष्णु को प्रणाम करें। इसके बाद गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान सूर्य को जल का अर्घ्य दें। अब भगवान विष्णु की पूजा फल, फूल, दूध, दही, पंचामृत, धूप-दीप आदि से करें। भगवान की आरती उतारें। दिन भर उपवास रखें और शाम के समय एक बार फिर से भगवान की पूजा कर उनकी आरती करें। व्रत कथा सुनें। श्रीहरी को पीली वस्तुओं का भोग लगाएं। तत्पश्चात फलाहार करें। अगले दिन सुबह शुभ मुहूर्त में फिर से विष्णु जी की पूजा करें और व्रत खोलें।

Vishnu Mantra in Hindi – श्रीहरी के मंत्रों का जाप तुलसी या चंदन की माला से करना श्रेष्ठ और शुभ फलदायी माना गया है। देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु के इन मंत्रों का जाप करें।

संकल्प मंत्र :

सत्यस्थ: सत्यसंकल्प: सत्यवित् सत्यदस्तथा।
धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जित:।।
कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च।
श्रीपतिर्नृपति: श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जित:।।

भगवान विष्णु को प्रसन्न करने का मंत्र :

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।

भगवान विष्णु क्षमा मंत्र :

भक्तस्तुतो भक्तपर: कीर्तिद: कीर्तिवर्धन:।
कीर्तिर्दीप्ति: क्षमाकान्तिर्भक्तश्चैव दया परा।।

आइए शास्त्रानुसार जानें कि देवशयन की अवधि में साधक के लिए कौन से नियम व अनुशासन का पालन करना श्रेयस्कर है-

  • जो साधक वाक-सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं वे देवशयन की अवधि में मीठे पदार्थों का त्याग करें।
  • जो साधक दीर्घायु व आरोग्य की प्राप्ति चाहते हैं वे देवशयन की अवधि में तली हुई वस्तुओं का त्याग करें।
  • जो साधक वंशवृद्धि व पुत्र-पौत्रादि की उन्नति चाहते हैं वे देवशयन की अवधि में दूध एवं दूध से बनी वस्तुओं का त्याग करें।
  • जो साधक अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करना चाहते हैं वे देवशयन की अवधि में धातु के पात्र का त्याग कर पत्तों (पातल) पर भोजन करें।
  • जो साधक अपने समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों का क्षय करना चाहते हैं वे देवशयन की अवधि में अयाचित’ अथवा ‘एकभुक्त’ भोजन करें।
  • अयाचित’ से आशय उस भोजन से है जो याचना रहित अर्थात् बिना मांगे प्राप्त हो।
  • एकभुक्त’ से आशय केवल एक बार भोजन करने से है।

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