व्रत - त्यौहार शुभ मुहूर्त

अहोई अष्टमी: इस विधि से करें निर्जला व्रत, जानिए क्या है शुभ मुहूर्त

अहोई अष्टमी – Ahoi Ashtami Vrat Katha

करवा चौथ के चार दिन बाद अहोई अष्टमी व्रत त्योहार होता है. अहोई अष्‍टमी संतान की मनोकामना का दिन होता है. इस दिन संतान के लिए लंबी आयु और सुख-समृद्धि मांगी जाती है. कहा जाता है कि अहोई अष्टमी का व्रत करने से अहोई माता खुश होकर बच्चों की सलामती का आशीर्वाद देती हैं. इस बार अहोई अष्टमी व्रत 21 अक्टूबर को है. इस व्रत में महिलाएं तारों और चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोलती हैं. अहोई अष्टमी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी दिवाली से सिर्फ 7 दिन पहले मनाई जाती है. या यूं कहे कि ये व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है.

किसके लिए रखा जाता है व्रत ?

इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन व्रत रखा जाता है. उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं. इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं. संतान की सलामती से जुड़े इस व्रत का बहुत महत्व है. इस व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए करती हैं. कुछ महिलाएं इस व्रत को बच्चे की प्राप्ति के लिए भी करती हैं.

अहोई अष्टमी व्रत कथा

प्राचीन काल में एक साहुकार था, जिसके सात बेटे और सात बहुएं थी| इस साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी| दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं मिट्टी लाने जंगल में गई तो ननद भी उनके साथ हो ली| साहुकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी उस स्थान पर स्याहु (साही) अपने साथ बेटों से साथ रहती थी| मिट्टी काटते हुए ग़लती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया| स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी|

स्याहू के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभीयों से एक एक कर विनती करती हैं कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें| सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो जाती है| इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं| सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछा| पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी|

सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और उसे स्याहु के पास ले जाती है| रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं अचानक साहुकार की छोटी बहू की नज़र एक ओर जाती हैं, वह देखती है कि एक सांप गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है| इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है कि छोटी बहु ने उसके बच्चे के मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है| छोटी बहू इस पर कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है| गरूड़ पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है |

वहां स्याहु छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहु होने का अशीर्वाद देती है| स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहु का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है| अहोई का अर्थ एक प्रकार से यह भी होता है “अनहोनी से बचाना ” जैसे साहुकार की छोटी बहू ने कर दिखाया था|

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि

  • सुबह उठकर स्नान कर निर्जला व्रत करें.
  • सूरज ढलने के बाद अहोई पूजा की जाती है.
  • पूजा के दौरान अहोई कलेंडर और करवा लेकर पूजा करें.
  • कथा सुननें के बाद अहोई की माला दिवाली तक पहननी चाहिए.

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अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त 2019

  • पूजा समय – सांय 17:45 से 19:02 तक ( 21 अक्तूबर 2019)
  • तारों के दिखने का समय – 18:10 बजे
  • चंद्रोदय – रात्रि 11:46 (21 अक्तूबर 2019)
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ – प्रातः 6:44 बजे  ( 21 अक्तूबर 2019)
  • अष्टमी तिथि समाप्त –  प्रातः 5:25 बजे ( 22 अक्तूबर 2019)

अहोई अष्टमी पर कैसे करे पूजा ?

उसमें 8 कोष्ठक वाली एक पुतली बनाती हैं. कुछ जगहों पर दीपावली के पूजन के लिए कुछ प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं. पुतली के पास ही स्याऊ माता और उनके बच्चों की तस्वीर बनाई जाती है. उसके बाद जमीन पर चौक पूरकर पीले रंग से रंगे हुए कलश की स्थापना की जाती है. इसके बाद कच्ची रसोई बनाकर उसे भोग के लिए एक बड़े थाल में सजाया जाता है.

क्या करें कलश पूजन के बाद ?

कलश की पूजा अर्चना के बाद दीवार पर बनाई गई अहोई और स्याऊ माता की पूजा कर उन्हें दूध और भात का भोग लगाया जाता है. फिर शाम के वक्त चंद्रमा को अर्घ्य देकर कच्चा भोजन किया जाता है और इस व्रत की कथा सुनी जाती है.

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