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मूल नक्षत्र क्या है और मूल नक्षत्र में जन्मे जातक उसका क्या प्रभाव पड़ता है ?

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मूल नक्षत्र – Mula Nakshatra In Hindi

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व्यक्ति की कुंडली में मूल नक्षत्र का महत्व

भारतीय ज्योतिष के अनुसार, कुल 27 नक्षत्र होते हैं जिनमें अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती है। जबकि 28वां नक्षत्र अभिजीत है।

मूल नक्षत्र क्या है

मूल भी इन्ही नक्षत्रों में से एक है जिसे 19वां स्थान मिला है। मूल का अर्थ होता है जड़, जिसके चारो चरण धनु राशि में आते हैं। केतु और गुरु धनु राशि में उच्च स्थान पर होते हैं। मूल नक्षत्र का स्वामी केतु है जबकि राशि के स्वामी गुरु है इसलिए मूल नक्षत्र में जन्मे व्यक्ति पर केतु और गुरु का प्रभाव जीवन भर बना रहता है।

जहाँ एक तरफ केतु जीवन में नकारात्मकता को बढ़ाता है वहीं गुरु जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास करता है। केतु को छाया का गृह भी कहा जाता है जिसका धड़ राहु है। धनु राशि का स्वामी गुरु है इसीलिए मूल नक्षत्र में जन्मे जातक को धार्मिक और विष्णु, हनुमान जी का भक्त बना रहना चाहिए।

मूल नक्षत्र का व्यक्ति पर प्रभाव

कहा जाता है व्यक्ति के जीवन और उसका आचार-विचार, ग्रह और नक्षत्रों के हिसाब से होता है। अर्थात जो लोग शुभ नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे शांत स्वभाव के होते हैं जबकि अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने वाले थोड़े गुस्सैल और चिड़चिड़े हो जाते हैं।

मूल नक्षत्र भी उन्ही नक्षत्रों में से एक है। माना जाता है मूल नक्षत्र ईमानदार परंतु जिद्दी स्वभाव के होते हैं। आमतौर ये लक्ष्य केंद्रित होते हैं और कठिन से कठिन लक्ष्य को भी प्राप्त करने का प्रयास करते रहते हैं।

मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति क्या करें?

नक्षत्र के सकारात्मक प्रभावों के लिए मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातको को नियमित रूप से निम्नलिखित उपाय या पूजा करनी चाहिए।

  • पीपल के वृक्ष में प्रसाद और जल चढ़ाना चाहिए।
  • सदैव हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।
  • बाल्यावस्था में रोजाना सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए।
  • गुरु और गायत्री उपासना भी नकारात्मक प्रभाव को खत्म करती है।
  • शिव जी, हनुमान जी और गणेश जी की उपासना करें।

ऊपर बताए गए सभी उपायों में से कोई भी एक उपाय करके भी मूल नक्षत्र के विपरीत प्रभावों से बचा जा सकता है।

मूल नक्षत्र का व्यक्ति पर सकारात्मक प्रभाव

मूल नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति के विचार दृढ होते हैं, इनमे निर्णय लेने की क्षमता भी बहुत अच्छी होती है। ये जातक पढाई-लिखाई में अव्वल होते हैं और इनकी बुद्धि बहतु टीवी होती है। इन लोगों को शोध कार्यों में सफलता मिल सकती है। कुशल होने के साथ-साथ ये लोग बहतु अच्छे वक्ता भी होते हैं। इनकी भावुक प्रवृति इन्हे दयालु और सबका भला करने वाला बनाती है।

मूल नक्षत्र का व्यक्ति पर नकारात्मक प्रभाव

मूल नक्षत्र का स्वामी केतु होता है और राशि का स्वामी गुरु होता है। यदि व्यक्ति की कुंडली में केतु और गुरु की स्थिति अच्छी नहीं होती तो जातक बहुत जिद्दी और गुसैल हो जाते हैं। ऐसे लोगों की रूचि विनाशकारी कार्यों में बढ़ सकती है। इनमे इर्षा की भावना भी हो सकती है।

खराब स्थिति होने के चलते, ये लोग अपनी शक्तियों का दुरूपयोग भी करने लगते हैं। कई बार ऐसे लोग गलत कार्यों में फंसकर अपना करियर बर्बाद कर लेते हैं। इन लोगों के पैरों में हमेशा तकलीफ बनी रहती है। ऐसे जातक के माता-पिता यदि पूरी तरह भगवान विष्णु और हनुमानजी की शरण में रहें तो जातक का जीवन अच्छा हो सकता है।

मूल नक्षत्र के दुष्प्रभावों से बचने के उपाय

यदि किसी बालक की कुंडली में मूल नक्षत्र का दुष्प्रभाव है तो निम्नलिखित उपाय करके बच्चे को मूल नक्षत्र के नकरात्मक प्रभावों से बचाया जा सकता है।

  • जन्म के 27 दिन बाद दोबारा मूल नक्षत्र आने पर नक्षत्र शांति की पूजा करा लें।
  • बच्चे के 8 वर्ष तक होने तक माता-पिता रोजाना नियम पूर्वक ॐ नमः शिवाय का जाप करें।
  • यदि उम्र 8 वर्ष से ज्यादा हो गयी है तो मूल नक्षत्र शांति पूजा की जरूरत नहीं होती। क्योंकि आमतौर पर संकट केवल 8 वर्ष की आयु तक ही रहता है।
  • अगर मूल नक्षत्र के नकारात्मक प्रभाव के कारण बच्चे का स्वास्थ्य खराब रहता है या बच्चा कमजोर है तो बालक की
  • माता को पूर्णिमा का उपवास रखना चाहिए।

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